देश की राजनीति में अब महिलाओं को केंद्र में रखकर योजनाएं बनाना नया चलन बनता जा रहा है। थिंक टैंक PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च की ताज़ा रिपोर्ट ने इस बदलाव को संख्याओं में बयां किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में देश के 12 राज्यों ने महिलाओं के बैंक खातों में 1.68 लाख करोड़ रुपये की नकद सहायता दी है।
तीन साल पहले तक केवल दो राज्य ऐसी बिना शर्त नकद हस्तांतरण (Unconditional Cash Transfer – UCT) योजनाएं चला रहे थे। लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 12 तक पहुंच गई है। इनमें मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, छत्तीसगढ़, राजस्थान, बिहार, झारखंड और केरल जैसे राज्य शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन 12 में से छह राज्य राजस्व घाटे (Revenue Deficit) में चल रहे हैं — यानी उनकी आमदनी से खर्च ज़्यादा है। फिर भी, महिला कल्याण योजनाओं पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि यदि इन योजनाओं को खर्च से हटाया जाए, तो इन राज्यों की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर दिखाई देती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन योजनाओं का उद्देश्य सिर्फ कल्याण नहीं, बल्कि राजनीतिक सशक्तिकरण भी है। महिलाओं के वोट बैंक को मज़बूत करने के लिए कई राज्य सरकारें इन योजनाओं को चुनावी रणनीति के रूप में देख रही हैं।
वहीं, राज्य सरकारों का कहना है कि इन योजनाओं से महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी है। उनके अनुसार, जब पैसा सीधे महिला के खाते में पहुंचता है, तो परिवार की वित्तीय स्थिरता में सुधार होता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खपत बढ़ती है।
रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि महिलाओं को सशक्त करने की यह नीति सामाजिक दृष्टि से सकारात्मक है, लेकिन राज्यों को अब यह तय करना होगा कि लोकलुभावन राजनीति और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
“महिला सशक्तिकरण योजनाएं अब भारतीय राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुकी हैं — सवाल सिर्फ यह है कि क्या राज्य इनके आर्थिक बोझ को लंबे समय तक झेल पाएंगे।”