चीनी हस्तक्षेप पर विवाद: 'जीवित बुद्ध' की परंपरा में क्यों दखल देना चाहता है चीन?

चीनी हस्तक्षेप पर विवाद: 'जीवित बुद्ध' की परंपरा में क्यों दखल देना चाहता है चीन?

नई दिल्ली/बीजिंग।
तिब्बत के बौद्ध धर्म में 'जीवित बुद्ध' यानी पुनर्जन्म की परंपरा 700 वर्षों से चली आ रही है, लेकिन आज यह धार्मिक और राजनीतिक टकराव का केंद्र बन चुकी है। धर्म को औपचारिक रूप से खारिज कर चुके चीन ने अब दलाई लामा के उत्तराधिकारी की नियुक्ति प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिशें तेज कर दी हैं — और यही बात तिब्बतियों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी परेशान कर रही है।

क्या है 'जीवित बुद्ध' की परंपरा?

बौद्ध मान्यताओं के अनुसार, दलाई लामा किसी साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि एक "बोधिसत्व" (ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर आत्मा) का पुनर्जन्म होते हैं। जब एक दलाई लामा का निधन होता है, तो उनके अनुयायी विभिन्न धार्मिक प्रक्रियाओं के जरिये उनके पुनर्जन्म के संकेत खोजते हैं। यह प्रक्रिया महीनों या वर्षों तक चल सकती है और इसमें आध्यात्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ परंपरागत जांच-पड़ताल भी शामिल होती है।

दलाई लामा का उत्तराधिकारी कौन चुनेगा?

14वें और वर्तमान दलाई लामा (तेनजिन ग्यात्सो), जो अब 89 वर्ष के हो चुके हैं, पहले ही कह चुके हैं कि उनका उत्तराधिकारी तिब्बती समुदाय और धार्मिक परंपराओं के अनुसार चुना जाएगा — न कि किसी राजनीतिक सत्ता के इशारे पर। वे यह भी संकेत दे चुके हैं कि अगला दलाई लामा भारत में जन्म ले सकता है, न कि चीन के कब्जे वाले तिब्बत में।

चीन क्यों चाहता है नियंत्रण?

चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया था और 1959 में तिब्बत विद्रोह के बाद दलाई लामा भारत में शरण ले चुके हैं। तब से चीन दलाई लामा को अलगाववादी और "राजनीतिक खतरा" मानता है। अब चीन चाहता है कि वह स्वयं दलाई लामा के उत्तराधिकारी की पहचान करे — जिससे तिब्बत पर उसका राजनीतिक व धार्मिक नियंत्रण और मजबूत हो सके।

चीन ने 2007 में एक कानून पारित किया जिसके अनुसार किसी भी 'जीवित बुद्ध' (reincarnated lama) की पहचान करने से पहले सरकारी मंजूरी लेनी होगी। तिब्बती इसे अपने धर्म और आत्म-संप्रभुता पर सीधा हमला मानते हैं।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

भारत, अमेरिका और यूरोपीय देश इस मामले में चीन के हस्तक्षेप का विरोध कर चुके हैं। अमेरिका ने यह साफ कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी का चुनाव तिब्बती समुदाय द्वारा ही किया जाना चाहिए। अमेरिका ने 2020 में 'तिब्बत नीति और समर्थन अधिनियम' (TPSA) भी पारित किया, जिसमें तिब्बत की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की बात कही गई है।