कांग्रेस ने 'ऑपरेशन सिंदूर' पर बहस से थरूर-तिवारी को क्यों रखा बाहर? उठ रहे हैं अहम सवाल

कांग्रेस ने 'ऑपरेशन सिंदूर' पर बहस से थरूर-तिवारी को क्यों रखा बाहर? उठ रहे हैं अहम सवाल

संसद में 'ऑपरेशन सिंदूर' पर हुई बहस के दौरान कांग्रेस ने अपने दो प्रमुख और अनुभवी सांसदों — शशि थरूर और मनीष तिवारी — को चर्चा से बाहर रखा। यह फैसला अब पार्टी के भीतर और बाहर कई सवालों को जन्म दे रहा है। क्या कांग्रेस सच में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर गंभीर विमर्श चाहती है, या फिर वह अपने ही जानकार नेताओं की आवाज को दबा रही है?

क्या है 'ऑपरेशन सिंदूर'?

'ऑपरेशन सिंदूर' भारतीय सेना का एक हालिया सैन्य अभियान है, जिसने सीमापार आतंकवाद के खिलाफ एक सशक्त संदेश दिया है। इस ऑपरेशन की संसद में चर्चा होनी थी, और यह उम्मीद की जा रही थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर गहरी समझ रखने वाले कांग्रेस नेता इसपर मजबूती से बोलेंगे।

थरूर और तिवारी को क्यों नहीं मौका मिला?

शशि थरूर विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति व सुरक्षा मामलों में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। मनीष तिवारी भी रक्षा मामलों की समिति में रहे हैं और उन्होंने पहले कई बार आतंकवाद व सीमा सुरक्षा पर सटीक टिप्पणियां की हैं।

इसके बावजूद कांग्रेस ने इन दोनों को संसद में बोलने का मौका नहीं दिया। इसकी जगह पार्टी की ओर से कुछ अन्य नेताओं ने बेहद सतही और राजनीतिक बयानबाजी पर आधारित भाषण दिए, जिससे विषय की गंभीरता कम होती दिखी।

क्या कांग्रेस डर रही है अपने ही नेताओं से?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि थरूर और तिवारी जैसे नेता अक्सर पार्टी लाइन से अलग, तथ्य आधारित और संतुलित राय रखते हैं — जो कांग्रेस नेतृत्व को असहज कर सकती है। कांग्रेस शायद यह नहीं चाहती थी कि कोई नेता 'ऑपरेशन सिंदूर' की सराहना करते हुए सरकार के निर्णय की खुले मंच पर प्रशंसा कर दे।

यह कदम किसे नुकसान पहुंचाता है?

यह निर्णय केवल कांग्रेस के भीतर गुटबाजी को ही नहीं दर्शाता, बल्कि यह देश के व्यापक हितों को भी प्रभावित करता है। जब राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर राजनीतिक दल अपने सबसे जानकार चेहरों को चुप करवा दें, तो यह संसद की गरिमा और लोकतंत्र की बहस पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।