अमेरिका ने दबाया सच: रूस-चीन ऑयल डील पर चुप्पी

अमेरिका ने दबाया सच: रूस-चीन ऑयल डील पर चुप्पी

नई दिल्ली, 20 अगस्त 2025।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बयान ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। हाल ही में जारी आंकड़ों में उन्होंने भारत के रूस से तेल खरीदकर मुनाफा कमाने की बात स्वीकार की, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि उन्होंने चीन और ईरान की भूमिका को नज़रअंदाज़ कर दिया।

चीन पर चुप्पी क्यों?

2025 के आधिकारिक आंकड़े दिखाते हैं कि चीन ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में जबरदस्त बढ़ोतरी की है। बीते सालों में पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद बीजिंग ने मॉस्को से डिस्काउंट पर बड़े पैमाने पर तेल खरीदा। इससे चीन न सिर्फ अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहा है, बल्कि डॉलर के बजाय युआन और रूबल में भुगतान करके पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था को चुनौती भी दे रहा है। इसके बावजूद अमेरिकी मंत्री ने अपने बयान में चीन का ज़िक्र तक नहीं किया।

ईरान का खेल

ईरान भी इसी खेमे में सक्रिय है। अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के बावजूद तेहरान अपने तेल को छुपे रास्तों से एशियाई देशों तक पहुंचा रहा है। रूस और ईरान की "शैडो फ्लीट" एक साथ मिलकर कच्चा तेल एशिया के बाज़ारों में भेज रही है। लेकिन वाशिंगटन इन तथ्यों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है।

भारत को निशाना क्यों?

विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका भारत की तेल रणनीति पर ज़्यादा जोर दे रहा है क्योंकि नई दिल्ली खुलेआम रूस से तेल खरीदकर रिफाइन कर पश्चिमी देशों को बेच रहा है। भारत के लिए यह सौदा दोहरा मुनाफा है—सस्ता कच्चा तेल और ऊंचे दाम पर तैयार पेट्रोल-डीजल का निर्यात। यही कारण है कि अमेरिकी वित्त मंत्री ने अपने बयान में भारत को "मुनाफाखोर" बताने की कोशिश की।

विशेषज्ञों की राय

ऊर्जा विश्लेषक मानते हैं कि अमेरिका जानबूझकर चीन और ईरान को चर्चा से बाहर रख रहा है। एक तरफ वाशिंगटन बीजिंग के खिलाफ पहले ही व्यापार युद्ध में उलझा है, दूसरी तरफ ईरान से बातचीत के दरवाजे बंद करने का खतरा भी नहीं लेना चाहता। ऐसे में भारत को दबाव में लाना उनके लिए आसान रास्ता है।