कैनबरा।
हालाँकि ऑस्ट्रेलिया में आधिकारिक रूप से कोई डेथ टैक्स (मृत्यु कर) नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में किए गए दो अलग-अलग कर संबंधी बदलावों ने व्यवहारिक रूप से ऐसी ही व्यवस्था को जन्म दे दिया है। इन बदलावों के कारण विरासत में मिलने वाली संपत्ति पर कर का बोझ बढ़ रहा है, जिससे आम नागरिकों और कर विशेषज्ञों में गहरी चिंता देखी जा रही है।
पहला बदलाव कैपिटल गेन टैक्स (CGT) से जुड़ा है। पहले किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी संपत्ति को उत्तराधिकारियों को सौंपते समय कर देनदारी सीमित रहती थी। अब, यदि वारिस उस संपत्ति को आगे चलकर बेचते हैं, तो उन्हें उस मूल्य वृद्धि पर कर देना पड़ता है जो मृतक के स्वामित्व के समय से जुड़ी होती है। इससे दशकों पुरानी संपत्तियों पर भी भारी कर लग सकता है।
दूसरा बदलाव सुपरएन्यूएशन (रिटायरमेंट फंड) से संबंधित है। यदि यह राशि मृतक के आश्रित न होने वाले व्यक्ति को मिलती है, तो उस पर कर लगाया जाता है। कई मामलों में यह कर दर 15 से 30 प्रतिशत तक पहुँच जाती है, जिससे परिवार को मिलने वाली वास्तविक राशि काफी कम हो जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये दोनों व्यवस्थाएँ मिलकर एक अप्रत्यक्ष डेथ टैक्स जैसा प्रभाव पैदा कर रही हैं, जबकि सरकार आधिकारिक तौर पर ऐसे किसी कर के अस्तित्व से इनकार करती रही है। आलोचकों का आरोप है कि यह सरकार की राजस्व बढ़ाने की एक “चुपचाप अपनाई गई रणनीति” है, जिस पर सार्वजनिक बहस नहीं हुई।
कर नीति विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे अधिक असर मध्यम वर्ग और छोटे व्यवसाय मालिकों पर पड़ रहा है, जिनकी जीवन भर की बचत अब अगली पीढ़ी तक पूरी तरह नहीं पहुँच पा रही। कई लोगों ने इसे पीढ़ीगत संपत्ति हस्तांतरण पर अनुचित बोझ बताया है।
सरकार की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन बढ़ती आलोचना के बीच आने वाले समय में कर प्रणाली की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर बहस तेज होने की संभावना है।