वॉशिंगटन। अमेरिका में एच-1बी वीज़ा विवाद गहराने के बीच भारतीय मूल के दो दिग्गज प्रोफेशनल्स ने अपने दम पर नई ऊँचाई हासिल की है। दोनों को अमेरिकी कंपनियों ने CEO पद पर नियुक्त किया है। यह उपलब्धि उस समय आई है, जब बाइडेन प्रशासन ने एच-1बी वीज़ा आवेदन के लिए करीब 88 लाख रुपये (1,05,000 डॉलर) की ऊँची जमा राशि तय की है, जिससे विदेशी टैलेंट को अवसर पाने में कठिनाई हो रही है।
भारतीय मूल के प्रोफेशनल्स ने वर्षों से अमेरिका की टेक और बिज़नेस दुनिया में अपनी छाप छोड़ी है। गूगल के सुंदर पिचाई और माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला की तरह अब नई पीढ़ी के भारतीय मूल के CEO भी वैश्विक मंच पर पहुंच रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रमोशन न केवल व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि भारत-अमेरिका के बीच बढ़ती पेशेवर साझेदारी और भारतीय टैलेंट की वैश्विक मांग का प्रतीक भी है।
अमेरिकी प्रशासन द्वारा एच-1बी वीज़ा पॉलिसी में किए जा रहे बदलावों से भारतीय पेशेवर सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। ऊँची जमा राशि और सख्त प्रक्रियाएँ भारतीय युवाओं के लिए चुनौती बन गई हैं।
इसके बावजूद, भारतीय मूल के इन दो प्रोफेशनल्स की सफलता ने वीज़ा विवाद के बीच एक सकारात्मक संदेश दिया है कि प्रतिभा और कड़ी मेहनत से सीमाएँ पार की जा सकती हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय प्रोफेशनल्स की टेक्नोलॉजी, प्रबंधन और नवाचार में पकड़ उन्हें अमेरिकी कॉरपोरेट जगत में विशेष स्थान दिलाती है। बदलते हालात में भी भारतीय मूल के विशेषज्ञों का नेतृत्व अमेरिकी कंपनियों को नई दिशा दे रहा है।
👉 यह खबर भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा है कि कठिनाइयों और नीतिगत बाधाओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की जा सकती है।