वाशिंगटन। अमेरिका में प्रवासियों को दी जा रही सरकारी सहायता (वेलफेयर) को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विभिन्न देशों से आए प्रवासियों को मिलने वाली वेलफेयर-सहायता से जुड़ा एक विस्तृत आंकड़ा सार्वजनिक किया है। इस सूची में पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, नेपाल और यूक्रेन जैसे देशों के प्रवासी शामिल हैं, लेकिन भारत का नाम इसमें नहीं है, जिसे लेकर खास चर्चा हो रही है।
ट्रंप द्वारा जारी की गई यह सूची अमेरिका में रहने वाले प्रवासी परिवारों के बीच सरकारी सहायता लेने की दर को दर्शाती है। इसमें यह बताया गया है कि किसी देश से आए कितने प्रतिशत प्रवासी परिवार अमेरिकी सरकार की वेलफेयर योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार,
बांग्लादेश के लगभग 55 प्रतिशत प्रवासी परिवार अमेरिका में किसी न किसी वेलफेयर योजना का लाभ लेते हैं।
यूक्रेन के करीब 43 प्रतिशत,
पाकिस्तान के लगभग 40 प्रतिशत,
नेपाल के करीब 35 प्रतिशत,
जबकि चीन के लगभग 33 प्रतिशत प्रवासी परिवार सरकारी सहायता पर निर्भर बताए गए हैं।
इन आंकड़ों के आधार पर ट्रंप ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि कुछ देशों से आने वाले प्रवासी समुदाय अमेरिका की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर अपेक्षाकृत अधिक निर्भर हैं।
इस पूरी सूची में भारत का नाम शामिल न होना सबसे अहम बिंदु माना जा रहा है। जानकारों के अनुसार, इसका प्रमुख कारण यह है कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों और प्रवासियों की औसत आय अन्य प्रवासी समूहों की तुलना में अधिक है, जिससे उनकी वेलफेयर योजनाओं पर निर्भरता कम रहती है।
आंकड़े बताते हैं कि भारतीय समुदाय अमेरिका में शिक्षा, आईटी, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और बिज़नेस जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कार्यरत है। यही वजह है कि भारतीय प्रवासियों का सामाजिक-आर्थिक स्तर अपेक्षाकृत मजबूत माना जाता है और वे सरकारी सहायता की श्रेणी में कम आते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप द्वारा इस तरह की सूची साझा करना केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। अमेरिका में आव्रजन (इमिग्रेशन) लंबे समय से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है और ट्रंप अपने समर्थकों के बीच यह संदेश देने की कोशिश करते रहे हैं कि अवैध या कम-आय वाले प्रवासियों पर सरकारी संसाधनों का बोझ बढ़ रहा है।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि ऐसे आंकड़ों को संदर्भ के बिना पेश करना भ्रामक हो सकता है, क्योंकि कई प्रवासी शुरुआती वर्षों में सहायता लेते हैं, लेकिन बाद में वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान भी देते हैं।
भारत का इस सूची में न होना भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि भारतीय प्रवासी न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अमेरिकी समाज में एक उत्पादक और कर-दाता समुदाय के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना चुके हैं।