ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति से नाटो के अस्तित्व पर संकट

ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति से नाटो के अस्तित्व पर संकट

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की खुली इच्छा ने वैश्विक राजनीति में गहरी हलचल मचा दी है। ट्रंप के हालिया बयानों और “किसी भी तरह” ग्रीनलैंड हासिल करने की बात ने न केवल डेनमार्क को, बल्कि पूरे नाटो गठबंधन को असहज कर दिया है।

नाटो की बुनियाद अनुच्छेद 5 पर टिकी है, जिसके अनुसार किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी यह व्यवस्था इस धारणा पर आधारित थी कि सहयोगी देश कभी एक-दूसरे के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे। लेकिन ट्रंप की आक्रामक भाषा ने इस मूल सिद्धांत को ही सवालों के घेरे में ला दिया है।

ग्रीनलैंड: रणनीति या संसाधन?

ग्रीनलैंड, जो कि डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, पहले से ही अमेरिका को सैन्य ठिकानों और सुरक्षा सहयोग की अनुमति देता है। यदि उस पर कोई बाहरी हमला होता है, तो नाटो के तहत अमेरिका सहित सभी सदस्य देश उसकी रक्षा के लिए बाध्य हैं।

इसके बावजूद ट्रंप का कहना है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड की रक्षा करने में सक्षम नहीं है और अमेरिका को “स्वामित्व” चाहिए, केवल समझौता या संधि नहीं। आलोचकों का मानना है कि इसके पीछे ग्रीनलैंड में मौजूद दुर्लभ खनिज संसाधन और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ता सामरिक महत्व है।

नाटो पर सीधा हमला?

ट्रंप ने यहाँ तक कहा कि “ग्रीनलैंड अमेरिका के हाथों में होगा तो नाटो अधिक शक्तिशाली बनेगा।” यह बयान नाटो के अन्य सदस्यों के लिए चिंताजनक है, क्योंकि इसका अर्थ एक सहयोगी देश की संप्रभुता को नज़रअंदाज़ करना है।

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका किसी नाटो सदस्य देश के विरुद्ध सैन्य कदम उठाता है, तो नाटो जैसी संस्था का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है। उनका कहना है कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के अंत की शुरुआत होगी।

अमेरिका और नाटो: पुराना तनाव

ट्रंप का नाटो के प्रति नकारात्मक रवैया नया नहीं है। वे लंबे समय से इसे अमेरिका पर “अनुचित बोझ” बताते आए हैं और यूरोपीय देशों पर रक्षा खर्च कम करने का आरोप लगाते रहे हैं। ग्रीनलैंड मुद्दा इसी सोच का सबसे चरम उदाहरण माना जा रहा है।

वैश्विक असर

यदि अमेरिका सचमुच अपने किसी सहयोगी के क्षेत्र पर दबाव या बल प्रयोग करता है, तो इसका प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक गठबंधन प्रणाली, अंतरराष्ट्रीय कानून और सामूहिक सुरक्षा की पूरी अवधारणा कमजोर पड़ सकती है।

ग्रीनलैंड का प्रश्न अब केवल एक द्वीप का नहीं रह गया है। यह इस बात की परीक्षा है कि क्या आधुनिक विश्व व्यवस्था आपसी भरोसे और नियमों पर चलेगी, या फिर ताक़त ही अंतिम सत्य बन जाएगी।