दक्षिण अफ्रीका में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में इस बार कई अभूतपूर्व घटनाएं देखने को मिलीं। अमेरिका द्वारा सम्मेलन का बहिष्कार किए जाने के बाद अब अध्यक्षता हस्तांतरण को लेकर वॉशिंगटन और प्रिटोरिया के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया है। दक्षिण अफ्रीिकी राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने साफ कर दिया है कि जी-20 की अगली अध्यक्षता अमेरिका के किसी निम्न-स्तरीय प्रतिनिधि को नहीं सौंपी जाएगी।
जी-20 की सामान्य परंपरा के विपरीत, इस बार साझा घोषणापत्र को शिखर सम्मेलन के पहले ही दिन सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी गई। उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने इस दस्तावेज़ का विरोध करते हुए पूरा सम्मेलन ही छोड़ दिया था। बावजूद इसके, सभी सदस्य देशों ने दस्तावेज़ का समर्थन कर इसे ‘अभूतपूर्व वैश्विक सहमति’ करार दिया।
अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिए थे कि वह अध्यक्षता ग्रहण करने के लिए अपने दूतावास के प्रभारी अधिकारी को भेजेगा। इस पर दक्षिण अफ्रीका के विदेश मंत्री रोनाल्ड लामोला ने सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राष्ट्रपति रामाफोसा केवल राज्य प्रमुख, मंत्री या राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त विशेष दूत को ही कार्यभार सौंपेंगे।
“अध्यक्षता किसी भी स्तर के प्रतिनिधि को नहीं दी जा सकती। अमेरिका चाहे तो अभी भी योग्य प्रतिनिधि भेज सकता है,” लामोला ने कहा।
सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति रामाफोसा ने बिना नाम लिए डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधा। उन्होंने कहा,
“जी-20 ऐसा मंच नहीं है जहां किसी भी देश की भौगोलिक स्थिति, आर्थिक हैसियत या सैन्य ताकत यह तय करे कि किसकी आवाज़ सुनी जाएगी और किसे नज़रअंदाज़ किया जाएगा।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका की आपत्तियों के बावजूद जलवायु परिवर्तन से जुड़े हिस्से पर किसी तरह की दोबारा बातचीत नहीं होगी।
साझा घोषणापत्र में जलवायु परिवर्तन, ऋण राहत, बहुपक्षीय सहयोग, आतंकवाद और वैश्विक संघर्षों पर व्यापक संदेश दिया गया है।
आतंकवाद के हर रूप की कड़ी निंदा
“अच्छा” और “बुरा” आतंकवाद जैसी अवधारणाओं को खारिज
विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता और ऋण पुनर्गठन पर जोर
जलवायु लक्ष्यों को मजबूत करने का वैश्विक संकल्प
भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग— कि आतंकवाद का कोई उचित-अनुचित रूप नहीं होता— को भी दस्तावेज़ में स्पष्ट मान्यता मिली है।