राजनीति में कोई स्थायी दोस्त होता है और न कोई स्थायी दुश्मन – मातोश्री में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की हालिया मुलाकात ने इस कहावत को एक बार फिर सच साबित कर दिया है। 5 जुलाई को हिंदी विरोध के मंच पर साथ आने के बाद अब राज ठाकरे ने उद्धव के जन्मदिन पर 13 साल बाद मातोश्री पहुंचकर उन्हें बधाई दी। यह सिर्फ एक पारिवारिक मुलाकात नहीं मानी जा रही – इसके सियासी मायनों को लेकर हलचल तेज़ है, खासकर आगामी बीएमसी चुनाव के मद्देनज़र।
महाराष्ट्र की राजनीति में यह मुलाकात सामान्य नहीं मानी जा सकती। उद्धव ठाकरे जहां शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के प्रमुख हैं, वहीं राज ठाकरे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के संस्थापक और मुखिया। दोनों भाइयों के बीच पिछले दो दशकों से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है। हालांकि निजी संबंधों में दूरी के बाद भी कुछ पुराने किस्से इनकी निकटता की याद दिलाते हैं।
2000 के दशक की शुरुआत में जब उद्धव ठाकरे की तबीयत बिगड़ी थी, तो राज ठाकरे खुद उन्हें लीलावती अस्पताल लेकर गए थे। वहीं, बाला साहेब ठाकरे के निधन के समय भी राज मातोश्री पहुंचे थे, लेकिन तब शिवसैनिकों की नाराजगी झेलनी पड़ी थी। अब 2025 में, जब वे फिर से मातोश्री पहुंचे, तो यह सिर्फ जन्मदिन की बधाई नहीं थी – यह संभावित राजनीतिक गठबंधन का संकेत माना जा रहा है।
यदि बीएमसी चुनाव से पहले शिवसेना (उद्धव गुट) और एमएनएस के बीच कोई गठबंधन होता है, तो यह भाजपा और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
मुंबई जैसे बहुभाषी और भावनात्मक राजनीति से प्रभावित शहर में ठाकरे बंधुओं की साझा रणनीति मराठी मतदाताओं को एक मंच पर ला सकती है। इससे भाजपा के वोटबैंक में सेंध लग सकती है, वहीं शिंदे गुट की स्थिति भी असहज हो सकती है, जो पहले से ही 'असली शिवसेना' की पहचान को लेकर संघर्ष कर रहा है।
हालांकि, राज ठाकरे अभी हर कदम फूंक-फूंककर रख रहे हैं। बीते वर्षों में उन्होंने कई मुद्दों पर भाजपा के करीब रहने की कोशिश की है। ऐसे में उद्धव से संभावित गठबंधन का मतलब यह हो सकता है कि वे भाजपा से दूरी बना रहे हैं – या फिर एक नई सियासी जगह तलाश रहे हैं जो भाजपा-विरोधी, मगर महाराष्ट्र केंद्रित हो।
5 जुलाई को हिंदी भाषा के विरोध के मंच से उद्धव और राज ने साथ आने का ऐलान किया था – उद्धव ने यहां तक कहा, "साथ आए हैं, साथ रहने के लिए।" लेकिन राजनीतिक धरातल पर 'साथ रहना' सिर्फ भावनाओं से नहीं होता – सीट बंटवारे, नेतृत्व, एजेंडा, और रणनीति पर समझौते भी जरूरी होंगे।