काठमांडू।
नेपाल की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ आ चुका है। सोशल मीडिया बैन के विरोध में शुरू हुआ Gen-Z आंदोलन अब देश के लिए बड़े राजनीतिक परिवर्तन का वाहक बन गया है। इस आंदोलन के दबाव में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अस्थायी सरकार की कमान सौंप दी।
नेपाल सरकार ने कुछ सप्ताह पहले सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले से युवाओं और खासकर छात्र समुदाय में जबरदस्त नाराज़गी फैल गई।
आठ सितंबर से काठमांडू और अन्य शहरों में Gen-Z नेतृत्व वाले प्रदर्शन शुरू हुए।
देखते ही देखते आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया। सरकारी दफ्तरों और संसद भवन के बाहर तोड़फोड़ हुई।
पुलिस और प्रदर्शनकारियों में कई बार टकराव हुआ, जिसमें अब तक 50 से अधिक लोगों की जान गई और सैकड़ों घायल हुए।
युवा आंदोलनकारियों का कहना था कि यह सिर्फ सोशल मीडिया की आज़ादी का मुद्दा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, राजनीतिक जवाबदेही और पारदर्शिता की लड़ाई है।
लगातार हिंसा और बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने 9 सितंबर को इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही नेपाल में सत्ता का शून्य पैदा हो गया। संसद में कोई भी दल स्पष्ट बहुमत साबित नहीं कर पा रहा था।
इस स्थिति में राष्ट्रपति पौडेल ने सभी प्रमुख दलों और युवा आंदोलन से संवाद कर अंतरिम प्रधानमंत्री चुनने का फैसला लिया। काठमांडू के मेयर बालेन शाह का नाम सबसे पहले आया, लेकिन उन्होंने पद स्वीकार करने से मना कर दिया। अंततः पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की पर सहमति बनी।
सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला प्रधान न्यायाधीश रह चुकी हैं। न्यायपालिका में उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई कड़े और भ्रष्टाचार विरोधी फैसले दिए।
उनकी छवि एक ईमानदार, पारदर्शी और भ्रष्टाचार से लड़ने वाली महिला नेता की रही है।
इसी कारण आंदोलनकारी युवाओं ने उन्हें स्वीकार किया और उनकी नियुक्ति पर विरोध शांत हुआ।
कार्की ने शपथ ग्रहण करते हुए कहा कि वे देश को संकट से निकालने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूत करने का हर संभव प्रयास करेंगी।
युवाओं ने सुशीला कार्की के सामने पाँच शर्तें रखीं, जिन्हें अंतरिम सरकार ने स्वीकार कर लिया है।
आम चुनाव 6 से 12 महीने में कराना।
→ सरकार ने आश्वासन दिया कि निर्धारित अवधि में चुनाव होंगे।
संसद को तुरंत भंग करना।
→ यह कदम उठाया जा चुका है, वर्तमान संसद अस्तित्व में नहीं रहेगी।
नागरिक-सैन्य संयुक्त सरकार।
→ आंदोलनकारियों की मांग के अनुसार नागरिक नेतृत्व के साथ सेना को भी सरकार में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
भ्रष्टाचार जांच के लिए न्यायिक आयोग।
→ पुराने नेताओं और दलों की संपत्ति की जांच करने के लिए स्वतंत्र आयोग का गठन होगा।
आंदोलन के दौरान हुई हिंसा की निष्पक्ष जांच।
→ सरकार ने वादा किया है कि पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की हिंसा—दोनों मामलों की स्वतंत्र जांच होगी और पीड़ितों को न्याय मिलेगा।
हालाँकि सुशीला कार्की की नियुक्ति ने आंदोलन को शांत किया है, लेकिन आगे की राह आसान नहीं होगी।
राजनीतिक बहिष्कार: शपथ समारोह में कई बड़े नेता और संसद के अध्यक्ष शामिल नहीं हुए। यह संकेत है कि पारंपरिक दल अभी भी विरोध की मुद्रा में हैं।
स्थिरता की चुनौती: आंदोलन से उपजा आक्रोश अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। अगर सरकार वादों पर खरी नहीं उतरी तो असंतोष फिर भड़क सकता है।
न्याय और पुनर्निर्माण: 50 से अधिक लोगों की मौत और भारी क्षति के बाद जनता निष्पक्ष जांच और पुनर्निर्माण की उम्मीद कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय नजरें: नेपाल की इस अस्थिरता पर भारत, चीन और अन्य पड़ोसी देशों की भी नज़र है। इसीलिए सरकार को संतुलन साधकर कूटनीति और आंतरिक राजनीति दोनों मोर्चों पर सावधानी से कदम बढ़ाने होंगे।