न्यूज़ डेस्क | 28 जून 2025
रूस को लेकर वैश्विक मंच पर एक बड़ा भू-राजनीतिक विभाजन स्पष्ट रूप से उभर रहा है। एक ओर जहां यूरोप रूस की सैन्य गतिविधियों और आक्रामक नीतियों से डरा हुआ है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका इस पूरे मुद्दे पर अपेक्षाकृत तटस्थ रुख अपनाता नजर आ रहा है। इस रणनीतिक भिन्नता ने अब अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में भी दूरी बढ़ा दी है।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने जिस तरह से अपनी सीमाओं के आसपास सैन्य ताकत बढ़ाई है, उससे यूरोपीय देश खासे चिंतित हैं। बाल्टिक देशों, पोलैंड, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश रूस को एक सीधा खतरा मानते हैं और नाटो के तहत सैन्य तैयारियों को बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा रूस द्वारा ऊर्जा आपूर्ति को हथियार बनाने की आशंका भी यूरोप को बेचैन कर रही है।
हाल के महीनों में अमेरिका ने रूस के खिलाफ कार्रवाई को लेकर संयमित और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। राष्ट्रपति जो बाइडेन प्रशासन स्पष्ट रूप से चीन को अपनी प्राथमिक चुनौती मानता है। वाशिंगटन रूस पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय, इंडो-पैसिफिक में चीन की बढ़ती ताकत को रोकने में व्यस्त है। यही वजह है कि यूरोपीय देश अमेरिका की प्राथमिकताओं को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं।
नाटो गठबंधन जिसकी स्थापना ही सामूहिक सुरक्षा के उद्देश्य से हुई थी, अब आंतरिक मतभेदों का सामना कर रहा है। फ्रांस और जर्मनी जहां रूस के खिलाफ सख्त रुख चाहते हैं, वहीं अमेरिका चाहता है कि यूरोपीय देश अपने रक्षा खर्च खुद बढ़ाएं। यह मतभेद आने वाले समय में नाटो की प्रभावशीलता पर भी असर डाल सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और यूरोप की रूस नीति में यही असहमति बनी रही, तो यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा ट्रांसअटलांटिक विभाजन हो सकता है। इससे चीन और रूस जैसे देश और मजबूत होंगे और लोकतांत्रिक देशों का वैश्विक प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।
आज जब वैश्विक मंच पर अधिनायकवादी ताकतें चुनौती दे रही हैं, ऐसे में अमेरिका और यूरोप के बीच एकता और तालमेल बेहद जरूरी है। रूस के मुद्दे पर मतभेद न केवल भू-राजनीतिक समीकरणों को बदल सकते हैं, बल्कि वैश्विक स्थिरता को भी खतरे में डाल सकते हैं।