पूर्व थलसेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे की कथित आत्मकथा को लेकर देश की राजनीति में तीखा विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे के केंद्र में कांग्रेस नेता राहुल गांधी हैं, जिन पर आरोप है कि उन्होंने संसद में ऐसी किताब का हवाला दिया, जो अभी तक प्रकाशित ही नहीं हुई है।
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस मामले को गंभीर बताते हुए राहुल गांधी से माफी की मांग की है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया कि प्रकाशक Penguin India ने स्पष्ट कर दिया है कि जनरल नरवणे की कोई भी किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि राहुल गांधी के पास उस किताब की प्रति कैसे पहुंची।
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि जिस किताब के आधार पर संसद में बयान दिया गया, उसे न तो लेखक और न ही प्रकाशक ने प्रमाणित किया है। उन्होंने इसे संसदीय मर्यादाओं के खिलाफ बताया। वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया कि यह मामला कॉपीराइट उल्लंघन से जुड़ा हो सकता है और राहुल गांधी ने जानबूझकर देश को गुमराह किया है।
भाजपा नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष से इस पूरे मामले की जांच कराने और आवश्यक होने पर राहुल गांधी की संसदीय सदस्यता पर कार्रवाई करने की मांग की है। उनका कहना है कि संसद के पटल पर असत्य दस्तावेजों का हवाला देना लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
दूसरी ओर कांग्रेस ने इन आरोपों को राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों को जानबूझकर गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है। कांग्रेस का तर्क है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है और सत्ता पक्ष इस विवाद के जरिए असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है।
फिलहाल यह मामला राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया तक पहुंचता नजर आ रहा है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या यह विवाद किसी औपचारिक जांच या कार्रवाई का रूप लेता है, या फिर सियासी शोर तक ही सीमित रह जाता है।