सिडनी।
ऑस्ट्रेलिया में बिजली नियामक संस्था Australian Energy Regulator द्वारा बिजली शुल्क प्रणाली में प्रस्तावित बदलाव को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि यह प्रस्ताव लागू हुआ, तो कम आय वाले और कम बिजली उपयोग करने वाले लाखों परिवारों को सालाना लगभग 200 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है, जबकि अधिक बिजली खपत करने वाले उपभोक्ताओं को 1400 डॉलर तक का सीधा लाभ मिल सकता है।
प्रस्ताव के तहत बिजली बिल की संरचना में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। इसमें फिक्स्ड चार्ज (स्थायी शुल्क) को बढ़ाने और प्रति यूनिट बिजली दर को घटाने की योजना है। इसका परिणाम यह होगा कि बिजली की बचत करने वाले परिवार—जैसे अकेले रहने वाले बुज़ुर्ग, पेंशनभोगी, छात्र और कम आय वाले लोग—कम खपत के बावजूद अधिक तय शुल्क चुकाने को मजबूर होंगे।
ऊर्जा नीति विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से असंतुलित है। जिन घरों में बड़े मकान, कई एयर कंडीशनर, इलेक्ट्रिक वाहन और अधिक बिजली खपत वाले उपकरण हैं, उन्हें प्रति यूनिट सस्ती बिजली का लाभ मिलेगा। इसके उलट, सीमित साधनों वाले परिवारों की मासिक लागत बढ़ जाएगी, जबकि उनकी खपत पहले से ही न्यूनतम है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह प्रस्ताव ऊर्जा संरक्षण और जलवायु लक्ष्यों के खिलाफ जाता है। ऑस्ट्रेलियाई सरकार वर्षों से नागरिकों को बिजली बचाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए प्रोत्साहित करती रही है, लेकिन नई शुल्क व्यवस्था में बिजली बचाने का कोई आर्थिक लाभ नहीं दिखता।
उपभोक्ता अधिकार संगठनों ने चेताया है कि यह नीति ऊर्जा गरीबी (Energy Poverty) को और बढ़ा सकती है, जहां लोग आवश्यक बिजली सेवाएं वहन करने में असमर्थ हो जाएंगे। उनका कहना है कि बिजली जैसी बुनियादी सेवा की कीमत तय करते समय केवल नेटवर्क लागत नहीं, बल्कि सामाजिक प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
नियामक संस्था का कहना है कि यह प्रस्ताव अभी जन परामर्श प्रक्रिया में है और अंतिम निर्णय से पहले जनता, विशेषज्ञों और राज्यों की राय ली जाएगी। हालांकि आलोचकों का मानना है कि मौजूदा स्वरूप में यह योजना लागू हुई तो इसका राजनीतिक और सामाजिक विरोध तेज़ हो सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों ने सरकार से मांग की है कि वह ऐसा वैकल्पिक मॉडल अपनाए जिसमें
कम खपत करने वालों को संरक्षण मिले,
ऊर्जा बचत को प्रोत्साहन जारी रहे, और
कमजोर आय वर्ग पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव न पड़े।
फिलहाल यह मुद्दा ऑस्ट्रेलिया में बिजली की बढ़ती लागत और जीवन यापन के संकट के बीच एक बड़े सार्वजनिक बहस का रूप ले चुका है।