नई दिल्ली।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद देशभर में गुस्सा और शोक का माहौल है। शहीदों के परिजनों की आंखें अभी भी नम हैं। ऐसे में एशिया कप में भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मुकाबला खेला जाना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है—क्या खेल और कारोबार की मजबूरियां राष्ट्रभक्ति से बड़ी हो गई हैं?
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हाल ही में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। जवानों की शहादत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की सच्चाई को एक बार फिर उजागर किया। देश के विभिन्न हिस्सों से आवाजें उठ रही हैं कि जब सीमा पर गोलियां चल रही हों, तो मैदान पर चौके–छक्के क्यों?
सूत्र बताते हैं कि भारत सरकार ने मैच रद्द करने पर विचार जरूर किया, लेकिन एशियाई क्रिकेट परिषद (एसीसी) और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के दबाव में पीछे हटना पड़ा। broadcasting अधिकारों, प्रायोजकों और अरबों रुपये के कॉन्ट्रैक्ट ने इस फैसले को और कठिन बना दिया। क्रिकेट बोर्ड का कहना है कि टूर्नामेंट से हटना या मैच से इंकार करना आर्थिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर महंगा पड़ सकता है।
सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक, आम लोगों का गुस्सा साफ दिख रहा है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या शहीदों के खून से बड़ा विज्ञापन का पैसा हो गया है? बहुत से पूर्व क्रिकेटर भी मानते हैं कि इस वक्त पाकिस्तान से क्रिकेट खेलना देश की भावनाओं के विपरीत है।
भारत–पाक क्रिकेट हमेशा ही सिर्फ खेल से ज्यादा रहा है। यह कूटनीति, सुरक्षा और राजनीति से गहराई से जुड़ा मसला है। जहां एक ओर सरकार खेल को खेल की तरह देखने की दलील देती है, वहीं दूसरी ओर आतंकी घटनाएं इस तर्क को कमजोर कर देती हैं।