सिडनी, ऑस्ट्रेलिया – लेबर पार्टी को प्रधानमंत्री एंथनी एल्बनीज़ के गढ़, इनर वेस्ट सिडनी में आवास नीति को लेकर एक बड़ा आंतरिक संघर्ष झेलना पड़ रहा है। इनर वेस्ट के मेयर डार्सी बर्न (Darcy Byrne) ने न्यू साउथ वेल्स (NSW) की प्रीमियर क्रिस मिंस की आवास योजना को अस्वीकार करते हुए एक वैकल्पिक योजना पेश की है, लेकिन उनकी खुद की "डेंसिटी पुश" यानी जनसंख्या घनत्व बढ़ाने की योजना को भी व्यापक समर्थन नहीं मिल पाया है।
यह संघर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रधानमंत्री एल्बनीज़ के निर्वाचन क्षेत्र में हो रहा है, जो लेबर पार्टी की एक मजबूत पकड़ वाला क्षेत्र माना जाता है। प्रीमियर मिंस ने राज्यभर में आवास संकट से निपटने के लिए उच्च घनत्व वाली परियोजनाएं प्रस्तावित की थीं, जिनका उद्देश्य तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक घर उपलब्ध कराना था। लेकिन इनर वेस्ट काउंसिल, जिसके प्रमुख डार्सी बर्न हैं, ने इस योजना को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह स्थानीय समुदाय की आवश्यकताओं और चरित्र के खिलाफ है।
बर्न ने मिंस की योजना के विरोध में खुद की आवास नीति प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने "स्मार्ट डेंसिटी" का प्रस्ताव दिया — यानी चयनित स्थानों पर मध्यम ऊंचाई वाली इमारतें, साइकिल पथों, हरियाली और स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ संतुलित विकास। उन्होंने कहा कि "हम अव्यवस्थित विकास नहीं चाहते, बल्कि सुनियोजित और स्थानीय पहचान के अनुरूप आवास चाहते हैं।"
हालांकि बर्न की योजना को कुछ स्थानीय निवासियों और काउंसलरों का समर्थन मिला, लेकिन पार्टी के भीतर और बाहर कई लोग अब भी असंतुष्ट हैं। कुछ का कहना है कि यह योजना बहुत सीमित है और हाउसिंग क्राइसिस की गंभीरता को हल नहीं कर पाएगी। वहीं, कुछ स्थानीय लोगों को डर है कि घनत्व बढ़ने से ट्रैफिक, स्कूलों और परिवहन व्यवस्था पर और दबाव पड़ेगा।
यह विभाजन एल्बनीज़ सरकार के लिए चिंता का कारण बन सकता है, क्योंकि यह दिखाता है कि पार्टी के अंदर भी आवास नीति पर एकमत नहीं है। यदि यह मुद्दा समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो यह अगले राज्य और संघीय चुनावों में लेबर के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है — खासकर शहरी मतदाताओं के बीच, जो आवास संकट से सबसे अधिक प्रभावित हैं।
निष्कर्ष: इनर वेस्ट सिडनी में आवास नीति को लेकर लेबर पार्टी में चल रही खींचतान इस बात का संकेत है कि तेजी से बदलती शहरी जरूरतों के साथ तालमेल बिठाना अब सिर्फ नीति नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व का सवाल बनता जा रहा है।