नई दिल्ली, 25 अगस्त 2025 — भारत ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित अपनी बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली Integrated Air Defence Weapon System (IADWS) का पहला उड़ान परीक्षण (Maiden Flight Test) सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इस प्रणाली को ‘सुदर्शन चक्रा’ नाम दिया गया है। ओडिशा तट पर हुए इस ऐतिहासिक परीक्षण ने भारत की वायु रक्षा क्षमता को एक नए युग में प्रवेश कराया है।
IADWS एक एकीकृत (Integrated) रक्षा प्रणाली है जो सतह-से-हवा मिसाइलों (Surface-to-Air Missiles) और हाई-एनर्जी लेज़र हथियारों को जोड़कर काम करती है। इसका मकसद है —
एक साथ कई हवाई खतरों का सामना करना
सीमा क्षेत्रों में आने वाले ड्रोन, मिसाइल और दुश्मन विमानों को नष्ट करना
सेना को मल्टी-लेयर सुरक्षा कवच प्रदान करना
परीक्षण 24 अगस्त 2025 को ओडिशा के तटीय रेंज से किया गया।
DRDO की रिपोर्ट के अनुसार, प्रणाली ने अपेक्षित सभी मानकों पर खरा उतरते हुए तेज़ प्रतिक्रिया (Quick Reaction) और सटीक लक्ष्यभेदन (Precision Strike) की क्षमता दिखाई।
इसमें प्रयुक्त लेज़र-आधारित हथियारों ने ड्रोन लक्ष्यों को सफलतापूर्वक भेदकर अपनी काउंटर-यूएवी क्षमता भी सिद्ध की।
मल्टी-लेयर शील्ड — यह एक साथ नजदीकी, मध्यम और लंबी दूरी के लक्ष्यों को रोक सकती है।
लेज़र-गाइडेड अटैक — उच्च-शक्ति वाले लेज़र हथियार छोटे ड्रोन और क्रूज़ मिसाइलों को तुरंत गिराने में सक्षम।
नेटवर्क-केंद्रित आर्किटेक्चर — राडार, सेंसर और मिसाइल लॉन्चर आपस में जुड़े हुए, जिससे हर प्रकार के खतरे पर समन्वित हमला संभव।
ऑल वेदर कैपेबिलिटी — बरसात, धुंध या बर्फीले मौसम में भी इसकी कार्यक्षमता प्रभावित नहीं होती।
सीमा सुरक्षा में मजबूती — चीन और पाकिस्तान की ओर से संभावित हवाई खतरों का सामना करने के लिए यह प्रणाली निर्णायक हथियार साबित होगी।
आत्मनिर्भर भारत का उदाहरण — पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित यह प्रणाली विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करेगी।
भविष्य की चुनौतियों का समाधान — आधुनिक युद्ध में ड्रोन्स और हाई-स्पीड मिसाइलों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। IADWS इन्हें निपटने के लिए भारत को तैयार करेगा।
परीक्षण की खबर सामने आते ही पड़ोसी देश चीन ने इसकी क्षमता पर सवाल खड़े किए, वहीं भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रणाली ने भारत की वायु रक्षा को “गेम चेंजर” स्तर तक पहुँचा दिया है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यह भारत को विश्व के चुनिंदा देशों की कतार में लाकर खड़ा करता है, जो लेज़र-आधारित एयर डिफेंस विकसित कर चुके हैं।