अमेरिकी दबावों के आगे कभी नहीं झुका भारत: गेहूं रोकने से लेकर हैवी टैरिफ तक का इतिहास

अमेरिकी दबावों के आगे कभी नहीं झुका भारत: गेहूं रोकने से लेकर हैवी टैरिफ तक का इतिहास

भारत और अमेरिका के रिश्ते समय-समय पर चुनौतियों से गुज़रे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी भी विदेशी दबावों के सामने झुकने की नीति नहीं अपनाई। चाहे बात 1965 के युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा गेहूं रोकने की हो, पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद लगे प्रतिबंधों की, या फिर हाल ही में लगाए गए भारी टैरिफ की—भारत ने हर बार संप्रभुता और स्वाभिमान के साथ अपना रास्ता चुना।

1965: गेहूं की धमकी और हरित क्रांति की शुरुआत

भारत जब 1965 में पाकिस्तान से युद्ध लड़ रहा था, तब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने भारत को दिए जा रहे गेहूं की आपूर्ति रोक दी थी। लेकिन इस दबाव के आगे भारत नहीं झुका। इसके बजाय, इस संकट को अवसर में बदलते हुए हरित क्रांति की नींव रखी गई, जिससे भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ा।

1998: पोखरण परीक्षण और अमेरिकी सैंक्शन

1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर दुनिया को चौंका दिया। इसके जवाब में अमेरिका ने भारत पर कई आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध लगाए। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने इन सैंक्शन का डटकर सामना किया। भारत ने दो टूक कहा—"हम अपनी सुरक्षा नीति खुद तय करेंगे।"

2020 के बाद: ट्रेड वॉर और टैरिफ की तलवार

हाल के वर्षों में अमेरिका ने भारत से आने वाले कई उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए। ट्रंप प्रशासन से लेकर उसके बाद की सरकारों तक, व्यापारिक दबाव बनाकर अमेरिका ने भारत से समझौते की उम्मीद की। लेकिन भारत ने हमेशा अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी और वैकल्पिक बाजारों की ओर कदम बढ़ाए।

भारत की विदेश नीति: आत्मसम्मान सर्वोपरि

भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी खासियत रही है—"वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना के साथ-साथ आत्मसम्मान से समझौता न करना। हर अंतरराष्ट्रीय दबाव के समय भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले करेगा, न कि किसी धमकी या लालच के कारण।