ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर के एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में पढ़ चुके 100 से अधिक यहूदी पूर्व छात्रों ने स्कूल प्रशासन और एक पूर्व प्रिंसिपल के खिलाफ क्लास-एक्शन मुकदमा दायर किया है। मुकदमे में आरोप लगाया गया है कि स्कूल परिसर में लंबे समय तक यहूदी-विरोधी (एंटीसेमिटिक) व्यवहार को न केवल अनदेखा किया गया, बल्कि कई मामलों में उसे मौन समर्थन भी मिला।
पूर्व छात्रों का आरोप है कि स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें नाजी सलाम दिखाने, नाजी प्रतीकों के इस्तेमाल, और होलोकॉस्ट से जुड़ी अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, कुछ छात्रों द्वारा यहूदी विद्यार्थियों से “ओवन में चले जाओ” जैसी टिप्पणियां की गईं, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों के सामूहिक नरसंहार की ओर इशारा करती हैं।
मुकदमे में यह भी कहा गया है कि यह उत्पीड़न केवल छात्रों तक सीमित नहीं था, बल्कि कुछ मौकों पर स्कूल स्टाफ की मौजूदगी में हुआ और इसके बावजूद कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई। पीड़ितों का दावा है कि कई बार औपचारिक शिकायतें दर्ज कराने के बावजूद स्कूल प्रबंधन ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया, जिससे उत्पीड़न को बढ़ावा मिला।
कानूनी दस्तावेजों के अनुसार, इस कथित भेदभाव और मानसिक प्रताड़ना के कारण कई छात्रों को लंबे समय तक मानसिक तनाव, आत्मविश्वास की कमी और शैक्षणिक नुकसान झेलना पड़ा। वकीलों का कहना है कि यह मामला केवल व्यक्तिगत दुर्व्यवहार का नहीं, बल्कि एक संस्थागत विफलता को उजागर करता है, जहां छात्रों को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण देने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की गई।
स्कूल प्रशासन की ओर से अब तक आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, एक संक्षिप्त बयान में कहा गया है कि स्कूल इन आरोपों को गंभीरता से ले रहा है और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार अपना पक्ष रखेगा। पूर्व प्रिंसिपल के प्रतिनिधियों ने भी अभी तक कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है।
इस मामले ने ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा संस्थानों में नस्लवाद, धार्मिक असहिष्णुता और छात्रों की सुरक्षा को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है। यहूदी समुदाय के नेताओं और मानवाधिकार संगठनों ने स्वतंत्र जांच, जवाबदेही तय करने और स्कूलों में सख्त एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नीतियों को लागू करने की मांग की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला ऑस्ट्रेलियाई शिक्षा प्रणाली में भेदभाव के खिलाफ कानूनी और नीतिगत बदलावों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।