ऑस्ट्रेलिया में चरमपंथियों की घुसपैठ, आव्रजन नीति और विरोध प्रदर्शनों पर उठे सवाल

ऑस्ट्रेलिया में चरमपंथियों की घुसपैठ, आव्रजन नीति और विरोध प्रदर्शनों पर उठे सवाल

सिडनी। ऑस्ट्रेलिया में फ़िलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों ने नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। 3 अगस्त को सिडनी हार्बर ब्रिज पर आयोजित रैली में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित पत्रकार जूलियन असांजे और फुटबॉलर क्रेग फ़ॉस्टर शामिल हुए। इस दौरान एक प्रदर्शनकारी ने आयतुल्लाह खोमैनी की तस्वीर लहराई, जिसने देश की राजनीति और सुरक्षा हलकों में हलचल मचा दी।

विदेशी संघर्षों की छाया

विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना केवल फ़िलिस्तीन समर्थन तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने यह चिंता बढ़ा दी है कि क्या ऑस्ट्रेलिया अब विदेशी संघर्षों का नया अखाड़ा बन रहा है। चरमपंथी ताक़तें स्थानीय प्रदर्शनों को अपने प्रोपेगैंडा और राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर रही हैं।

नई आव्रजन नीति (NAI) पर बहस

इसी बीच सरकार की नई आव्रजन नीति (NAI) पर भी गर्म बहस छिड़ गई है। कुछ समुदायों का कहना है कि उदार इमिग्रेशन पॉलिसी के चलते बाहरी विचारधाराएं देश में घुसपैठ कर रही हैं। दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता चेतावनी दे रहे हैं कि चरमपंथ के नाम पर पूरे आप्रवासी समाज को कटघरे में खड़ा करना सही नहीं होगा।

एंटी-इमिग्रेशन भावनाएं तेज़

खोमैनी की तस्वीर वाली घटना ने एंटी-इमिग्रेशन लॉबी को भी ताक़त दी है। उनका तर्क है कि ऐसे प्रदर्शनों से यह साबित होता है कि ढीली आव्रजन नीतियों के कारण ऑस्ट्रेलिया में बाहरी संघर्ष और कट्टरपंथ पनप रहा है। विपक्षी दलों ने भी सरकार पर दबाव बढ़ाया है कि इमिग्रेशन नियमों को और कड़ा किया जाए।

सामाजिक सौहार्द पर असर

ऑस्ट्रेलिया की पहचान एक बहुसांस्कृतिक समाज के रूप में रही है। लेकिन लगातार बढ़ती एंटी-इमिग्रेशन आवाज़ें और चरमपंथी गतिविधियों के संकेत इस सामंजस्य पर असर डाल सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने पहले ही चेतावनी दी है कि ऐसे प्रदर्शनों की निगरानी सख़्ती से की जाएगी।

जनता की भूमिका अहम

विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन जनता को सजग रहना होगा कि कहीं उनके आंदोलन को चरमपंथी ताक़तें अपने मक़सद के लिए इस्तेमाल न कर लें।