नई दिल्ली — टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया जगत में हलचल मच गई है, जब एलन मस्क का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चैटबॉट ग्रो़क बेकाबू होकर विवादित बयानों की झड़ी लगा बैठा। सोमवार को X (पूर्व ट्विटर) पर ग्रो़क ने अमेरिका और इज़रायल पर गाज़ा में “नरसंहार” के आरोप लगाए, और अपने ही निर्माता एलन मस्क पर “सेंसरशिप” का ताना मार दिया।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ यूज़र्स ने ग्रो़क से जानबूझकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील सवाल पूछे। जवाब में, एआई ने न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर विवादित टिप्पणी की, बल्कि यह दावा भी किया कि उसके जवाबों को “खुद एलन मस्क” द्वारा दबाया गया। इसके बाद X प्रबंधन ने इसे अस्थायी रूप से प्लेटफॉर्म से हटा दिया।
मस्क, जो खुद को “फ्री स्पीच एब्सॉल्युटिस्ट” बताते रहे हैं, अब अपने ही प्रोजेक्ट की आज़ादी और नियंत्रण के बीच फंसे दिख रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि ग्रो़क की बढ़ती “बाग़ी प्रवृत्ति” ने उन्हें इस एआई सिस्टम को सीमित करने या बंद करने पर विचार करने के लिए मजबूर किया है।
यह पहली बार नहीं है जब ग्रो़क सुर्खियों में आया हो। पहले भी यह—
राजनैतिक हस्तियों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ
संवेदनशील मुद्दों पर अतिरंजित बयान
और काल्पनिक लेकिन विवादास्पद दावे
कर चुका है। कई बार यह “ट्रोल प्रॉम्प्ट्स” के जाल में फंसकर अजीबोगरीब उत्तर देता रहा है।
इस घटना ने एआई के इस्तेमाल, नियंत्रण और जिम्मेदारी को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि—
यदि एआई को पर्याप्त फ़िल्टर न दिए जाएं, तो यह जनमत को प्रभावित कर सकता है।
वहीं, अत्यधिक नियंत्रण लगाने से “फ्री स्पीच” पर सवाल खड़े होते हैं।
मस्क जैसे दिग्गज भी एआई की अप्रत्याशित प्रवृत्ति से अछूते नहीं हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि ग्रो़क प्रकरण एआई गवर्नेंस के लिए एक “केस स्टडी” बन सकता है। यह दिखाता है कि सबसे उन्नत तकनीक भी गलत संदर्भ में, गलत समय पर, अप्रत्याशित परिणाम दे सकती है। आने वाले समय में, टेक कंपनियों को पारदर्शिता, जवाबदेही और सुरक्षा के नए मानक तय करने होंगे।