कांग्रेस में अंतर्कलह फिर सतह पर, शकील अहमद का राहुल गांधी पर तीखा हमला

कांग्रेस में अंतर्कलह फिर सतह पर, शकील अहमद का राहुल गांधी पर तीखा हमला

नई दिल्ली। कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ नेता शकील अहमद के बयान से पार्टी के भीतर एक बार फिर सियासी भूचाल आ गया है। अहमद ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें “डरपोक, असुरक्षित और गैर-लोकतांत्रिक” करार दिया है। उनके इस बयान को कांग्रेस में नेतृत्व संकट और अंदरूनी असंतोष से जोड़कर देखा जा रहा है।

शकील अहमद ने कहा कि राहुल गांधी वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं की मौजूदगी में खुद को असहज महसूस करते हैं, विशेषकर उन नेताओं के सामने जिनकी जनता में मजबूत पकड़ है। इसी असहजता के कारण वे ऐसे नेताओं को आगे बढ़ा रहे हैं जिनका कोई ठोस जनाधार नहीं है। अहमद के अनुसार, पार्टी में अनुभव और जनसमर्थन की बजाय चापलूसी को प्राथमिकता दी जा रही है।

उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी पार्टी के वरिष्ठ सहयोगियों की सलाह को नजरअंदाज करते हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया में लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन नहीं करते। अहमद ने कहा कि राहुल गांधी का यह मानना है कि कांग्रेस अपनी राष्ट्रीय पहचान के चलते सत्ता की राजनीति में कभी हाशिये पर नहीं जा सकती, जबकि जमीनी हकीकत इससे अलग है।

पूर्व कांग्रेसी नेता ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अमेठी लोकसभा सीट का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए भी अपने परिवार की पारंपरिक सीट अमेठी नहीं जीत सके, जो उनके राजनीतिक रवैये और नेतृत्व शैली का परिणाम है।

शकील अहमद ने अपने बयान में कहा,
“राहुल गांधी किसी भी ऐसे व्यक्ति के साथ सहज नहीं होते जिनका बड़ा सार्वजनिक कद हो। वे ऐसे नेताओं के सामने ‘बॉस’ की भूमिका में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करते। यही असुरक्षा उन्हें तानाशाही और गैर-लोकतांत्रिक बनाती है।”

गौरतलब है कि शकील अहमद 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस से अलग हो गए थे। वे तीन बार विधायक और दो बार सांसद रह चुके हैं। इसके अलावा वे वर्ष 2000 से 2003 तक बिहार प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। हाल के दिनों में उनके बयानों को कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ खुली बगावत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शकील अहमद के ये आरोप केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चल रहे नेतृत्व और संगठनात्मक असंतोष को उजागर करते हैं। ऐसे बयानों से पार्टी की आंतरिक एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं, खासकर ऐसे समय में जब कांग्रेस लगातार चुनावी चुनौतियों से जूझ रही है।