सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) के इनर वेस्ट इलाके में स्थित न्यूइंगटन कॉलेज एक बड़े विवाद का केंद्र बन गया है। यह स्कूल लंबे समय से केवल लड़कों की शिक्षा के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन हाल ही में प्रबंधन ने कॉलेज को सहशिक्षा (को-एजुकेशन) में बदलने का निर्णय लिया है। इस कदम का विरोध करते हुए एक छात्र ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है।
याचिका दायर करने वाले छात्र का कहना है कि स्कूल की 160 वर्ष से भी पुरानी परंपरा को अचानक तोड़ना न केवल संस्थान की ऐतिहासिक पहचान को नुकसान पहुँचाएगा बल्कि वर्तमान छात्रों के हितों के खिलाफ भी होगा। छात्र का तर्क है कि जिन परिवारों ने अपने बच्चों को न्यूइंगटन में दाखिल कराया, उन्होंने इसे लड़कों के विशेष विद्यालय के रूप में चुना था। ऐसे में अचानक सहशिक्षा लागू करना उनके विश्वास और अपेक्षाओं से खिलवाड़ है।
दूसरी ओर, न्यूइंगटन कॉलेज प्रशासन का कहना है कि समय के साथ शिक्षा की अवधारणा में बदलाव जरूरी है। प्रबंधन का तर्क है कि समाज में समान अवसर और लैंगिक संतुलन को बढ़ावा देने के लिए को-एजुकेशन सबसे प्रभावी तरीका है। उनके अनुसार, लड़के और लड़कियाँ साथ पढ़ेंगे तो न केवल शैक्षणिक विकास होगा बल्कि सामाजिक समझ और आपसी सहयोग की भावना भी प्रबल होगी।
मामला अब अदालत में पहुँच चुका है और सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं। छात्र और उसके समर्थक अभिभावक चाहते हैं कि न्यायालय स्कूल प्रबंधन के फैसले पर रोक लगाए। वहीं, प्रबंधन का कहना है कि उनका निर्णय भविष्य की शिक्षा व्यवस्था को देखते हुए लिया गया है और यह छात्रों के व्यापक हित में है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानूनी विवाद सिर्फ न्यूइंगटन तक सीमित नहीं रहेगा। ऑस्ट्रेलिया के कई पुराने और पारंपरिक निजी स्कूल अभी भी लड़कों या लड़कियों तक ही सीमित हैं। अगर अदालत छात्र के पक्ष में फैसला देती है, तो यह अन्य स्कूलों को भी प्रभावित कर सकता है। वहीं, अगर प्रबंधन का पक्ष मज़बूत हुआ तो सहशिक्षा की राह आसान हो जाएगी।
यह मामला शिक्षा जगत में परंपरा बनाम आधुनिकता की बहस को और तीखा कर रहा है। एक ओर वे लोग हैं जो मानते हैं कि सहशिक्षा समय की माँग है, वहीं दूसरी ओर अभिभावकों और छात्रों का एक वर्ग परंपरा और विशेष वातावरण को बनाए रखने के पक्ष में है। अदालत का फैसला न केवल न्यूइंगटन कॉलेज बल्कि पूरे देश के लिए दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।