ग्रीनलैंड पर ट्रंप की धमकी के बीच ऑस्ट्रेलिया ने डेनमार्क का समर्थन दोहराया

ग्रीनलैंड पर ट्रंप की धमकी के बीच ऑस्ट्रेलिया ने डेनमार्क का समर्थन दोहराया

कैनबरा/वॉशिंगटन:
ग्रीनलैंड की संप्रभुता को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ताज़ा धमकियों के बीच ऑस्ट्रेलिया ने स्पष्ट किया है कि इस क्षेत्र का भविष्य तय करने का अधिकार केवल ग्रीनलैंड और डेनमार्क को है। ऑस्ट्रेलिया की वरिष्ठ मंत्री और वित्त मंत्री केटी गैलाघर ने कहा कि कैनबरा इस मुद्दे पर अपने रुख को लेकर पूरी तरह स्पष्ट है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए नए व्यापारिक शुल्क (टैरिफ) लगाने की चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि फरवरी से डेनमार्क सहित कई यूरोपीय देशों से आयात होने वाले सामान पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा, जिसे जून से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किया जा सकता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ये शुल्क तब तक लागू रहेंगे, जब तक ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के साथ कोई “समझौता” नहीं हो जाता।

केटी गैलाघर ने रविवार को मीडिया से बातचीत में कहा, “टैरिफ के मामले में हमारा रुख साफ है—हम मुक्त व्यापार का समर्थन करते हैं और ऐसे प्रतिबंधों का समर्थन नहीं करते। जहां तक ग्रीनलैंड की संप्रभुता का सवाल है, यह पूरी तरह डेनमार्क और ग्रीनलैंड का आंतरिक मामला है।”

उन्होंने इस बात पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि यदि अमेरिका सैन्य बल के जरिए ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की कोशिश करता है, तो ऑस्ट्रेलिया की प्रतिक्रिया क्या होगी।

गौरतलब है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पहली बार 2019 में ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार सार्वजनिक रूप से रखा था, जिसके बाद से डेनमार्क और यूरोप के अन्य देशों में कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। हाल के महीनों में ट्रंप के बयानों में और तीखापन आया है, जिससे ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव बढ़ गया है।

आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह क्षेत्र उत्तरी अमेरिका की सुरक्षा, समुद्री मार्गों और प्राकृतिक संसाधनों—जैसे तेल और दुर्लभ खनिजों—के कारण वैश्विक राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। ग्रीनलैंड की लगभग 80 प्रतिशत भूमि बर्फ से ढकी है और यहां की अधिकांश आबादी तटीय इलाकों में रहती है।

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ग्रीनलैंड को लेकर बढ़ता तनाव आने वाले समय में अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के रिश्तों पर गहरा असर डाल सकता है।