अमेरिका की भरोसेमंद भूमिका पर गहराता संदेह

ऑस्ट्रेलिया के F-35 लड़ाकू विमानों को लेकर ‘किल स्विच’ की बहस तेज

अमेरिका की भरोसेमंद भूमिका पर गहराता संदेह

कैनबरा/लंदन।
अमेरिका द्वारा निर्मित F-35 लाइटनिंग-II स्टेल्थ लड़ाकू विमानों को लेकर उसके पारंपरिक सहयोगी देशों में असहजता और अविश्वास बढ़ता जा रहा है। आशंका यह जताई जा रही है कि क्या अमेरिका के पास इन विमानों को दूर से निष्क्रिय करने की कोई गुप्त तकनीकी क्षमता—जिसे अनौपचारिक रूप से “किल स्विच” कहा जा रहा है—मौजूद है।

यह बहस ऐसे समय उभरी है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति, अप्रत्याशित बयानों और सहयोगी देशों के प्रति कठोर रवैये ने वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ा दी है।

सहयोगियों के मन में उठते सवाल

ऑस्ट्रेलिया ने लगभग 17 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की लागत से 72 F-35A लड़ाकू विमान खरीदे हैं, जो उसकी वायु शक्ति की रीढ़ माने जाते हैं। अब सवाल यह है कि क्या संकट की स्थिति में इन विमानों पर ऑस्ट्रेलिया का पूर्ण और स्वतंत्र नियंत्रण रहेगा।

यह चिंता केवल ऑस्ट्रेलिया तक सीमित नहीं है।

  • स्विट्ज़रलैंड ने अपने F-35 सौदे को लेकर तकनीकी संप्रभुता पर सवाल उठाए हैं।

  • नॉर्वे ने पहले ही यह मुद्दा उठाया है कि क्या F-35 विमान उड़ान और मिशन से जुड़ा संवेदनशील डेटा अमेरिका को स्वतः भेजते हैं।

  • ब्रिटेन में हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि रॉयल एयर फ़ोर्स वास्तव में अपने सबसे उन्नत लड़ाकू विमान पर कितना नियंत्रण रखती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन सवालों का सार्वजनिक रूप से उठना अपने आप में बदलते वैश्विक हालात का संकेत है।

बदलती अमेरिकी भूमिका

रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका की छवि एक विश्वसनीय सुरक्षा गारंटर से बदलकर एक ऐसे शक्ति केंद्र की बनती जा रही है, जो अपने राष्ट्रीय हितों को सहयोगी देशों से ऊपर रखने में संकोच नहीं करता।

ऑस्ट्रेलियाई रक्षा विश्लेषक मार्कस हेलियर का कहना है कि अब यह मानकर नहीं चला जा सकता कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के हित हमेशा समान रहेंगे। उनके अनुसार, “यह धारणा टूट रही है कि अमेरिका साझा सामूहिक सुरक्षा की भावना से काम करेगा।”

जोखिम केवल F-35 तक सीमित नहीं

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह निर्भरता केवल लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया की रक्षा संरचना का बड़ा हिस्सा अमेरिकी तकनीक और आपूर्ति पर आधारित है, जिसमें शामिल हैं—

  • नौसेना के युद्धपोतों में लगा एजिस कॉम्बैट सिस्टम,

  • प्रस्तावित AUKUS परमाणु पनडुब्बी परियोजना,

  • और उन्नत गोला-बारूद व रक्षा सॉफ़्टवेयर की आपूर्ति।

यदि अमेरिका किसी भी कारण से सहयोग सीमित करता है, तो इससे ऑस्ट्रेलिया की सैन्य क्षमता पर सीधा असर पड़ सकता है।

‘अकल्पनीय’ पर भी सोचने की सलाह

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में देशों को उन परिदृश्यों पर भी विचार करना चाहिए, जिन्हें पहले अकल्पनीय माना जाता था।

उनके अनुसार, यदि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था से पीछे हटता है या उसे कमजोर करता है, तो इससे पूरी वैश्विक सुरक्षा संरचना प्रभावित होगी। ऐसे में आत्मनिर्भरता, वैकल्पिक साझेदारियों और स्वतंत्र रक्षा क्षमताओं पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है।

निष्कर्ष

F-35 को लेकर उठ रही ‘किल स्विच’ की बहस केवल एक तकनीकी सवाल नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन और भरोसे के संकट का प्रतीक है।
यह बहस संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में सहयोगी देशों को अपनी सुरक्षा रणनीतियों की पुनर्समीक्षा करनी पड़ सकती है—एक ऐसे दौर में, जहाँ पारंपरिक मित्रता और सैन्य गठबंधनों की स्थिरता अब सुनिश्चित नहीं मानी जा सकती।