नया वर्क ट्रेंड: "जॉब हगिंग" ने बढ़ाई चिंता

नया वर्क ट्रेंड: "जॉब हगिंग" ने बढ़ाई चिंता

ऑस्ट्रेलियाई कार्यस्थलों में एक नया ट्रेंड सामने आया है, जिसे विशेषज्ञ खतरनाक बता रहे हैं। अब तक “जॉब हॉपिंग” यानी बार-बार नौकरी बदलने की प्रवृत्ति आम रही है, लेकिन इसके उलट अब “जॉब हगिंग” तेजी से बढ़ रहा है।

क्या है जॉब हगिंग?

जॉब हगिंग वह स्थिति है जब कर्मचारी अपनी नौकरी से खुश न होने के बावजूद उसी में टिके रहते हैं। यह वफादारी नहीं, बल्कि मजबूरी और डर की देन है। आर्थिक अस्थिरता, बार-बार की छंटनी, महामारी का असर और एआई के बढ़ते खतरे ने लोगों को नौकरी छोड़ने से हिचकाया है।

क्यों बढ़ रहा है यह ट्रेंड?

बोल्डएचआर (BoldHR) की संस्थापक और मैनेजमेंट विशेषज्ञ रेबेका हॉटन ने बताया कि कर्मचारी इसलिए “जॉब हगिंग” कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि विकल्प और भी खराब हैं। उनका कहना है, “यह केवल रिस्क से बचने की प्रवृत्ति है, जो आर्थिक असुरक्षा और थकान से जन्मी है।”

एक सर्वे के अनुसार, हर तीन में से एक मैनेजर बर्नआउट (मानसिक थकान) से जूझ रहा है। ऐसे में कर्मचारी परिचित माहौल में टिके रहना ही सुरक्षित मानते हैं।

कंपनियों के लिए खतरे की घंटी

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह प्रवृत्ति संगठनों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। रेबेका हॉटन ने कहा, “जॉब हगर्स वफादार नहीं होते। जैसे ही बाजार सुधरेगा, ये लोग सबसे पहले चुपचाप नौकरी बदल देंगे।”

उन्होंने नेताओं को सलाह दी कि वे तुरंत कदम उठाएं और ऐसे कार्यस्थल बनाएं जहां लोग मजबूरी से नहीं बल्कि अपनी पसंद से टिके रहें।

भारत और युवा पीढ़ी पर असर

ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ यह ट्रेंड भारत समेत कई देशों में भी देखने को मिल सकता है, खासकर युवाओं में। महंगाई, अस्थिर रोजगार और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने मिलेनियल्स और जेन-ज़ी (Gen Z) को जॉब हगिंग की ओर धकेला है।


👉 सवाल यह है कि आने वाले समय में कंपनियां और कर्मचारी इस डर और थकान से कैसे बाहर निकलेंगे। क्या यह ट्रेंड लंबे समय तक रहेगा या जैसे ही बाजार संभलेगा, जॉब हगिंग की जगह फिर से जॉब हॉपिंग ले लेगी?