‘नैशोज़ को वापस लाओ’: वियतनाम युद्ध के दिग्गज और सेवानिवृत्त जनरल ने फिर से राष्ट्रीय सेवा शुरू करने की उठाई

ऑस्ट्रेलिया में अनिवार्य सैन्य सेवा योजना के 75 वर्ष पूरे होने पर पूर्व जनरल का बड़ा बयान

‘नैशोज़ को वापस लाओ’: वियतनाम युद्ध के दिग्गज और सेवानिवृत्त जनरल ने फिर से राष्ट्रीय सेवा शुरू करने की उठाई

ऑस्ट्रेलिया में अनिवार्य सैन्य सेवा (कंसक्रिप्शन) योजना की शुरुआत के 75 वर्ष पूरे होने के मौके पर एक सेवानिवृत्त मेजर जनरल और वियतनाम युद्ध के दिग्गज ने राष्ट्रीय सेवा को फिर से लागू करने की जोरदार मांग की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक अस्थिरता और बढ़ते सुरक्षा खतरों को देखते हुए देश को युवा पीढ़ी को फिर से सैन्य प्रशिक्षण से जोड़ने की आवश्यकता है।

पूर्व जनरल, जिन्हें वियतनाम युद्ध में उनकी बहादुरी और नेतृत्व के लिए कई सैन्य सम्मान मिल चुके हैं, ने कहा कि राष्ट्रीय सेवा न केवल रक्षा क्षमता को मजबूत करेगी बल्कि युवाओं में अनुशासन, जिम्मेदारी और राष्ट्रीय एकता की भावना भी बढ़ाएगी। उन्होंने कहा, “आज की दुनिया में सुरक्षा चुनौतियां तेजी से बदल रही हैं। हमें अपने युवाओं को तैयार रखना होगा।”

75 साल पहले शुरू हुई थी योजना

ऑस्ट्रेलिया में कंसक्रिप्शन योजना की शुरुआत 1951 में हुई थी, जिसके तहत युवाओं को अनिवार्य सैन्य सेवा के लिए बुलाया जाता था। इस योजना के तहत कई युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया और कुछ को वियतनाम युद्ध में भी भेजा गया। हालांकि, 1972 में इस योजना को समाप्त कर दिया गया था।

समर्थन और विरोध

जनरल के बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित अवधि की राष्ट्रीय सेवा से देश की सुरक्षा तैयारियों को मजबूती मिल सकती है। वहीं, मानवाधिकार समूहों और कुछ युवा संगठनों ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि अनिवार्य सैन्य सेवा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है।

एक विश्वविद्यालय छात्र ने कहा, “आज के समय में युवाओं के पास करियर और शिक्षा के कई विकल्प हैं। उन्हें अनिवार्य रूप से सेना में भेजना उचित नहीं होगा।”

सरकार की प्रतिक्रिया

सरकार ने फिलहाल इस प्रस्ताव पर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय सेवा को दोबारा शुरू करने की कोई तत्काल योजना नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि देश की सुरक्षा जरूरतों की समीक्षा नियमित रूप से की जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा हो सकती है, खासकर ऐसे समय में जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है।