ऑस्ट्रेलिया में युवाओं और बुजुर्ग पीढ़ी के बीच आर्थिक असमानता पर बहस तेज़ हो गई है। हर वर्ग – चाहे वह अमीर हो या मध्यमवर्गीय, नौकरीपेशा हो या कारोबारी – इस बात पर सहमत है कि युवाओं को मौजूदा आर्थिक व्यवस्था ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। इसे आम भाषा में “इंटरजेनरेशनल बास्टर्ड्री” यानी अंतरपीढ़ीगत अन्याय कहा जा रहा है।
पिछले दो दशकों में घरों की कीमतों ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है। औसत युवा परिवार के लिए खुद का मकान खरीदना लगभग असंभव हो गया है। बैंक से कर्ज लेना भी आसान नहीं, क्योंकि शुरुआती डाउन पेमेंट ही लाखों डॉलर तक पहुँच चुका है।
बुजुर्ग पीढ़ी, जिन्होंने कम कीमतों पर घर खरीदे थे, अब निवेश और किराये से बड़ा लाभ उठा रही है।
वहीं, युवा नौकरीपेशा परिवार किराये और महंगे होम लोन की मार झेल रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कर व्यवस्था में भी असंतुलन है।
नौकरीपेशा युवाओं को आयकर में बड़ी राशि चुकानी पड़ती है।
दूसरी ओर, बुजुर्गों और निवेशकों को टैक्स रियायतें, सुपरएनुएशन (रिटायरमेंट फंड) और संपत्ति निवेश से कर छूट मिलती है।
यही कारण है कि युवाओं को लगता है कि उनसे उनकी मेहनत की कमाई छीनकर नीतिगत लाभ बुजुर्ग पीढ़ी को दिया जा रहा है।
इस बार यह बहस केवल युवाओं तक सीमित नहीं रही। बुजुर्ग, राजनीतिक विश्लेषक, और यहां तक कि संपन्न वर्ग के लोग भी मानते हैं कि व्यवस्था अन्यायपूर्ण हो गई है।
आम सहमति है कि बिना ठोस सुधारों के आने वाले वर्षों में युवा पीढ़ी आर्थिक रूप से और पिछड़ जाएगी।
राजनीतिक दलों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे आयकर, आवास और रिटायरमेंट नीतियों में संतुलन लाएं।
सरकार के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है।
एक ओर बुजुर्ग मतदाताओं का दबदबा है, जो रियायतें खोना नहीं चाहते।
दूसरी ओर, युवाओं की हताशा बढ़ रही है, जो खुद को “खोई हुई पीढ़ी” कहने लगे हैं।
अगर जल्द ही समाधान नहीं निकाला गया, तो विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि सामाजिक असमानता और नाराज़गी इतनी गहरी हो सकती है कि आने वाले चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ेगा।