नोबेल की चाह और कश्मीर पर मतभेद: क्यों फीकी पड़ गई ट्रंप-मोदी की दोस्ती

नोबेल की चाह और कश्मीर पर मतभेद: क्यों फीकी पड़ गई ट्रंप-मोदी की दोस्ती

नई दिल्ली। कभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दोस्ती अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मिसाल मानी जाती थी। दोनों नेताओं ने मंच साझा किया, बड़े-बड़े कार्यक्रम किए और आपसी संबंधों को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का दावा किया। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। कश्मीर मुद्दे और नोबेल पुरस्कार की चाह ने इस ‘ब्रोमैंस’ को गहरी दरार में बदल दिया है।

शुरुआती दिनों की नज़दीकी

ट्रंप के पहले कार्यकाल में मोदी और ट्रंप ने एक-दूसरे को लेकर खुलकर प्रशंसा की। अमेरिका में आयोजित ‘Howdy Modi’ कार्यक्रम और भारत में हुए ‘Namaste Trump’ जैसे आयोजनों ने दोनों नेताओं को वैश्विक सुर्ख़ियों में ला दिया। उस समय यह माना जाने लगा था कि भारत-अमेरिका रिश्ते नई ऊँचाइयों को छू रहे हैं और दोनों नेताओं के बीच असाधारण समझ बनी हुई है।

नोबेल पुरस्कार की चाह और कड़वाहट

सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप को उम्मीद थी कि उन्हें शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिलेगा। इस दिशा में उन्होंने भारत से भी समर्थन की अपेक्षा जताई। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ, तो ट्रंप ने इसे निजी तौर पर अपमान की तरह लिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मुद्दे पर ट्रंप और मोदी के बीच हुई एक टेलीफोनिक बातचीत बेहद तल्ख हो गई। कहा जाता है कि ट्रंप ने नाराज़गी जताते हुए कठोर लहजे में मोदी से बात की।

कश्मीर पर अमेरिकी बयानबाज़ी

मुद्दों में सबसे बड़ा विवाद कश्मीर पर रहा। भारत हमेशा से यह कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और इस पर किसी तीसरे देश की दखलअंदाज़ी स्वीकार्य नहीं। इसके बावजूद ट्रंप ने कई बार सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें कश्मीर विवाद पर ‘मध्यस्थता’ करने को कहा है। भारत सरकार ने इस दावे को तुरंत खारिज किया और कहा कि ऐसा कोई आग्रह नहीं किया गया। यह प्रकरण दोनों देशों के रिश्तों में तनाव की बड़ी वजह बना।

रिश्तों की मौजूदा स्थिति

आज की स्थिति यह है कि वह गर्मजोशी, जो कभी दोनों नेताओं के बीच दिखती थी, अब गायब हो चुकी है। ट्रंप की नोबेल की महत्वाकांक्षा और कश्मीर पर अमेरिकी बयानबाज़ी ने उस दोस्ती को कमजोर कर दिया, जिसे कभी वैश्विक मंच पर सबसे मजबूत साझेदारी कहा जाता था।

भविष्य की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही दोनों देशों के रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते मजबूत बने रहेंगे, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर ट्रंप और मोदी के बीच पहले जैसी नज़दीकी लौटना मुश्किल है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यक्तिगत समीकरण अक्सर अहम भूमिका निभाते हैं, और यही समीकरण फिलहाल भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर डाल रहे हैं।