सिडनी:
आज का युवा जितना जुड़ा हुआ दिखता है, उतना ही अकेला महसूस कर रहा है। सोशल मीडिया की चकाचौंध और सतही संबंधों के बीच एक अदृश्य, लेकिन बेहद घातक महामारी चुपचाप हमारी पीढ़ी को खा रही है — अकेलापन।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल ही में इसे धूम्रपान और मोटापे की तरह गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट घोषित किया है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं: हर घंटे करीब 100 लोग अकेलेपन के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। साल भर में यह संख्या 8.7 लाख के करीब पहुंच जाती है।
डिजिटल युग की यह विडंबना है — हजारों 'फॉलोअर्स' और 'लाइक्स' होने के बावजूद एक युवा खुद को अनदेखा और अस्वीकार्य महसूस करता है। अकेलापन अब किसी उम्र या देश की सीमा में नहीं बंधा; यह एक वैश्विक आपदा बन चुका है।
विशेषज्ञ इसे "आध्यात्मिक सूखा" कह रहे हैं। यह वह आपदा है जो न सायरन बजाती है, न टीवी पर फ्लैश होती है — यह धीरे-धीरे दिलों में घर कर लेती है, कैफे की भीड़ में छिप जाती है, स्कूलों की कक्षाओं में गूंजती है।
भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से पारिवारिक देशों में भी अब यह संकट बढ़ रहा है। वहीं ऑस्ट्रेलिया में युवा पीढ़ी के बीच भावनात्मक अलगाव अब सामान्य स्थिति बन गई है। किशोरों में तो यह समस्या और भी गंभीर हो गई है।
स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए।
सरकार को अकेलेपन को स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाना होगा।
परिवार और समाज को सतही जुड़ाव से आगे बढ़कर गहरे संवाद और संबंधों की ओर लौटना होगा।
यह महामारी चुपचाप बढ़ रही है — मुस्कान के पीछे, 'इंस्टा-रील' के पीछे, और चैटबॉक्स के इमोजी के पीछे। और जब तक हम इससे लड़ने के लिए तैयार नहीं होते, हर घंटे 100 लोग ऐसे ही खोते रहेंगे।